फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर (FET)

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नमस्कार पाठको _/ \_
आज की पोस्ट में हम आपको बता रहे है की  FET किसे कहते है और FET कार्य प्रणाली क्या है। और FET का प्रयोग कँहा कँहा कर सकते है। जो मेरे दोस्त इलैक्ट्रोनिक्स सीख रहे है उनको  इलैक्ट्रोनिक्स कॉम्पोनेन्ट की जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। 

फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर (FET)

 

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FET या JFET (जंक्शन फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर) एक तीन सिरो वाली यूनिपोलर (Unipolar) ठोस अवस्था (Solid state) युक्ति है। इस ट्रांसिस्टर में ड्रेन करंट का नियंत्रण निर्वात ट्यूब की भांति वैधुतिक क्षेत्र के द्वारा किया जाता है।

संरचना FET को N- चैनल अथवा P- चैनल चिप पर बनाया जाता है परन्तु N-चैनल चिप को वरीयता प्रदान की जाती है । N-चैनल FET बनाने के लिए N-प्रकार के अर्द्धचालक की एक पतली छड़ ली जाती है।इस छड़ के मध्य में दो विपरीत पाश्व्रो पर P- प्रकार के जंक्शन डिफ्यूज (Diffuse) कर दिये जाते है

फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर (FET)
FET Construction
ये दो जंक्शन दो P-N डायोड्स गेट्स बनाते है और दोनों गेट्स के बीच बचा क्षेत्र चैनल कहलाता है। दोनों गेट्स को आन्तरिक रूप से संयोजित करके केवल एक संयोजी सिरा युक्ति से बाहर निकाला जाता है जिसे गेट (Gate) कहते है। छड़ के दोनों सिरों पर दो संयोजी सिरे (प्रत्येक पर एक) जोड़ दिये जाते है जो सोर्स(Source) तथा ड्रेन (Drain)कहलाते है।
फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर (FET)
FET N- channel -P- channel Symbol
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फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर (FET)

P- चैनल FET की संरचना, N- चैनल FET के समान होती है, अन्तर केवल यह होता है कि इसमें P- प्रकार की छड़ और N- प्रकार के जंक्शन प्रयोग किये जाते है।

  1. सोर्स(Source)-वह संयोजी सिरा जिससे बहुसंख्यक आवेश वाहक(Majority charge carriers) चैनल में प्रवेश करता है।
  2. ड्रेन(Drain)-वह संयोजी सिरा जिससे बहुसंख्यक आवेश वाहक चैनल से बाहर निकलते है।
  3. गेट(Gate)-दो अशुद्धिक्षेत्रो को आपस में अन्तः संयोजित करने से बना संयोजी सिरा। यह सोर्स से ड्रेन की ओर जाने वाले बहुसंख्यक आवेश वाहकों की सख्या का नियंत्रण करता है।

  कार्य प्रणाली N–चैनल FET में, सोर्स को बैटरी के ऋण सिरे तथा ड्रेन को बैट्री के धन सिरे से संयोजित किया जाता है। इसमें गेट सिरे को सदैव रिवर्सबायस स्थिति में रखा जाता है अर्थात इसमे गेट को ऋणात्मक रखा जाता है। जब VGSमान शून्य हो और VDSका मान भी शून्य हो तो ड्रेन ID का मान भी शून्य होता है। VDS का मान शून्य से ऊपर बढ़ाने पर ड्रेन करंट IDरैखिक व्यवहार (Linear manner) में प्रवाहित होने लगती है

(जबकि VGS का मान अभी भी शून्य है) यह करंट, शून्य गेट वोल्टेज ड्रेन करंट कहलाती है। करंट IDका नियंत्रण गेट वोल्टेज (-ve) द्वारा सम्पन्न होता है। इस ट्रांसिस्टर में करंट के प्रवाह में केवल एक ही प्रकार के आवेश वाहक भाग लेते है (N-चैनल में मुक्त इलैक्ट्रॉन्स तथा P- चैनल में होल्स) इसीलिये यह युक्ति यूनिपोलर युक्ति कहलाती है।

 

इन्हे भी देखे 🙄 

फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर के लाभ :

  1. उच्च इनपुट एम्पीडेन्स
  2. लघु आकार, सुदृढ़ता एवं दीर्घ आयु।
  3. निम्न शोरस्तर बढ़िया उच्च फ्रीक्वेन्सी रिसपॉन्स
  4. उत्तम उष्मीय स्थिरता
  5. उच्च पवार गेन।
फील्ड इफैक्ट ट्रांसिस्टर के उपयोग :
  1. ऑसिलोस्कोप तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक परीक्षक यन्त्रो में इनपुट एम्पलीफायर के रूप में।
  2. लॉजिक परिपथों में (in logic circuits)
  3. टी०वी० रिसीवर की मिक्सर स्टेज में।
  4. ऑपरेशनल एम्पलीफायर तथा ऑडियो एम्पलीफायर के टोन परिपथ में VVR (वोल्टेजवैरिएबिलरेसिस्टर) की भाँति ।
  5. कंप्यूटर्स के मैमोरी परिपथों में LSI(Large Scale integration) की भाँति।

 

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