ट्रायोड वाल्व

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सन 1907 में वैज्ञानिक डीफोरेस्ट (De-Forest) ने फ्लैमिंग के डायोड वाल्व में एक तीसरा इलैक्ट्रोड और जोड़ दिया। इस नये इलैक्ट्रोड को कन्ट्रोल ग्रिड नाम दिया गया। ग्रिड का अर्थ है जाली यह तीसरा इलैक्ट्रोड जालीदार बनाया गया और इसे कैथोड और एनोड के बीच लगाया गया। इस प्रकार डीफोरेस्ट ट्रायोड वाल्व के जन्मदाता बने और साथ ही इलैक्ट्रोनिक के क्षेत्र में एक नई क्रान्ति के सूत्रधार भी बन गये।

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ट्रायोड वाल्व (Triode Valve) 

ट्रायोड वाल्व
ट्रायोड वाल्व
कन्ट्रोल ग्रिड कैथोड से एनोड की ओर जाने वाले इलैक्ट्रॉन्स की संख्या  का प्रभावी नियन्त्रण करती है क्योंकि एनोड की अपेक्षा यह कैथोड के अधिक निकट होती है। इसे नेगेटिव वोल्टेज दिया जाता है जो ग्रिड बायस कहलाता है। इसे पॉजिटिव वोल्टेज नही दिया इसका कारण यह है कि यदि कन्ट्रोल ग्रिड को पॉजिटिव वोल्टेज दे दिया जाये तो यह भी एक एनोड की भांति कार्य करने लगेगी। क्योकि यह कैथोड के काफी निकट होती है इसलिए यह अधिक संख्या में इलैक्ट्रॉन्स को स्वयं आकर्षित कर लेगी। इस प्रकार अधिक एनोड करंट तथा ग्रिड करंट के कारण कैथोड करंट का मान काफी बढ़ जायेगा और वाल्व का कैथोड लाल गर्म होकर शीघ्र ही ख़राब हो जायेगा।

इन्हे भी देखे।

कैथोड से एनोड की ओर जाने वाले इलैक्ट्रॉन्स पर कन्ट्रोल ग्रिड का नियन्त्रण एनोड की अपेक्षा 500 गुना तक अधिक हो सकता है। ग्रिड बायस का मान बढ़ाने से एनोड करंट का मान घटता है और घटाने से बढ़ता है । यदि ग्रिड बायस का मान बढ़ाते जाये तो एक ऐसी स्थिति आ जाती है जब एनोड करंट का मान शून्य हो जाता है, यह स्थिति कट ऑफ बायस (Cut off bias) कहलाती है। ट्रायोड का उपयोग एम्पलीफिकेशन आदि के लिये किया जाता है।


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